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वन पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
कोऽय़ं देवो भवेत्साक्षाद्रुद्रो यक्षः सुरेश्वरः |  ३०   क
विद्यते हि गिरिश्रेष्ठे त्रिदशानां समागमः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति