वन पर्व  अध्याय ४०

वैशम्पाय़न उवाच

ततो हृष्टमना जिष्णुर्नाराचान्मर्मभेदिनः |  ३३   क
व्यसृजच्छतधा राजन्मय़ूखानिव भास्करः ||  ३३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति