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वन पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षणेन क्षीणवाणोऽथ संवृत्तः फल्गुनस्तदा |  ३५   क
वित्रासं च जगामाथ तं दृष्ट्वा शरसङ्क्षय़म् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति