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वन पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
किरातरूपी भगवांस्ततः पार्थो महावलः |  ४३   क
मुष्टिभिर्वज्रसंस्पर्शैर्धूममुत्पादय़न्मुखे |  ४३   ख
प्रजहार दुराधर्षे किरातसमरूपिणि ||  ४३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति