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वन पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्राशनिसमैर्मुष्टिभिर्भृशदारुणैः |  ४४   क
किरातरूपी भगवानर्दय़ामास फल्गुनम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति