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कर्ण पर्व
अध्याय ३४
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सञ्जय़ उवाच
तं कर्णः पञ्चविंशत्या नाराचानां समार्दय़त् |  ३५   क
मदोत्कटं वने दृप्तमुल्काभिरिव कुञ्जरम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति