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उद्योग पर्व
अध्याय ४०
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विदुर उवाच
मृतं पुत्रं दुःखपुष्टं मनुष्या; उत्क्षिप्य राजन्स्वगृहान्निर्हरन्ति |  १४   क
तं मुक्तकेशाः करुणं रुदन्त; श्चितामध्ये काष्ठमिव क्षिपन्ति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति