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उद्योग पर्व
अध्याय ४०
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विदुर उवाच
महान्तमप्यर्थमधर्मय़ुक्तं; यः सन्त्यजत्यनुपाक्रुष्ट एव |  २   क
सुखं स दुःखान्यवमुच्य शेते; जीर्णां त्वचं सर्प इवावमुच्य ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति