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भीष्म पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
प्रभाताय़ां तु शर्वर्यां प्रातरुत्थाय़ वै नृपः |  १   क
राज्ञः समाज्ञापय़त सेनां योजय़तेति ह |  १   ख
अद्य भीष्मो रणे क्रुद्धो निहनिष्यति सोमकान् ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति