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वन पर्व
अध्याय १४३
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वैशम्पाय़न उवाच
द्यौः स्वित्पतति किं भूमौ दीर्यन्ते पर्वता नु किम् |  ११   क
इति ते मेनिरे सर्वे पवनेन विमोहिताः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति