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वन पर्व
अध्याय २३५
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चित्रसेन उवाच
विदितोऽय़मभिप्राय़स्तत्रस्थेन महात्मना |  ३   क
दुर्योधनस्य पापस्य कर्णस्य च धनञ्जय़ ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति