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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
यदैव धौम्यानुमते महात्मा; कृत्वा जटाः प्रव्रजितः स जिष्णुः |  १४   क
तदैव तेषां न वभूव हर्षः; कुतो रतिस्तद्गतमानसानाम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति