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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ा हि मम सत्पुत्र यशो दीप्तमुपार्जितम् |  ३   क
जित्वा वज्रधरं सङ्ख्ये सहस्राक्षं शचीपतिम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति