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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
नूनं स पतितः शेते धरण्यां रुधिरोक्षितः |  ५२   क
शोभय़न्मेदिनीं गात्रैरादित्य इव पातितः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति