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विराट पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
धृष्टद्युम्नश्च दुर्धर्षः सर्वशस्त्रभृतां वरः |  १८   क
समस्ताक्षौहिणीपाला यज्वानो भूरिदक्षिणाः |  १८   ख
सर्वे शस्त्रास्त्रसम्पन्नाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति