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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
पराजय़मशोचन्तः कृतचित्ताश्च विक्रमे |  ४७   क
सर्वे सुनिश्चिता योद्धुमुदग्रमनसोऽभवन् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति