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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
किं नु मे हृदय़ं त्रस्तं वाक्यं सज्जति केशव |  ४   क
स्पन्दन्ति चाप्यनिष्टानि गात्रं सीदति चाच्युत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति