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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
स पपात ततो वाहात्स्वलोहितपरिस्रवः |  १०५   क
मनःशिलागिरेः शृङ्गं वज्रेणेवावदारितम् ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति