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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
स रोषान्निःश्वसन्राजन्निर्दहन्निव चक्षुषा |  १२२   क
द्रौणिं ह्यपश्यत्सङ्ग्रामे फल्गुनं च मुहुर्मुहुः ||  १२२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति