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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
जत्रुदेशे च सुभृशं वत्सदन्तैरताडय़त् |  १२६   क
स मूर्च्छां परमां गत्वा ध्वजय़ष्टिं समाश्रितः ||  १२६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति