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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
संशप्तकांश्च कौन्तेय़ः कुरूंश्चापि वृकोदरः |  १३०   क
वसुषेणं च पाञ्चालः कृत्स्नेन व्यधमद्रणे ||  १३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति