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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
एवमेव सदा भाव्यं स्थिरेणाजौ धनञ्जय़ |  ६७   क
असंमूढेन चास्त्राणां कर्तव्यं प्रतिपादनम् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति