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द्रोण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
यो यः स्म समरे पार्थं प्रतिसंरभते नरः |  ४८   क
तस्य तस्यान्तको वाणः शरीरमुपसर्पति ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति