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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालास्तु महाराज त्वरिता विजिगीषवः |  ४४   क
सर्वतोऽभ्यद्रवन्कर्णं पतत्रिण इव द्रुमम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति