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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
निपेतुरुर्व्यां समरे कर्णसाय़कपीडिताः |  ५४   क
कुर्वन्तो विविधान्नादान्वज्रनुन्ना इवाचलाः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति