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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
मृगमध्ये यथा सिंहो दृश्यते निर्भय़श्चरन् |  ५८   क
पाञ्चालानां तथा मध्ये कर्णोऽचरदभीतवत् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति