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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
वैश्वानरं यथा दीप्तं दह्यन्ते प्राप्य वै जनाः |  ६१   क
कर्णाग्निना रणे तद्वद्दग्धा भारत सृञ्जय़ाः ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति