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वन पर्व
अध्याय ४६
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सञ्जय़ उवाच
महेश्वरेण यो राजन्न जीर्णो ग्रस्तमूर्तिमान् |  २६   क
कस्तमुत्सहते वीरं युद्धे जरय़ितुं पुमान् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति