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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
तत्र याहि यतः कर्णो द्रावय़त्येष नो वलम् |  ८४   क
वर्जय़ित्वा रणे याहि सूतपुत्रं महारथम् |  ८४   ख
श्रमो मा वाधते कृष्ण यथा वा तव रोचते ||  ८४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति