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शल्य पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
यदा चापि न शक्नोति राष्ट्रं मोचय़ितुं नृप |  १७   क
अथ वैप्राश्निकांस्तत्र पप्रच्छ जनमेजय़ ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति