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वन पर्व
अध्याय ४६
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धृतराष्ट्र उवाच
यस्य मन्त्री च गोप्ता च सुहृच्चैव जनार्दनः |  ३८   क
हरिस्त्रैलोक्यनाथः स किं नु तस्य न निर्जितम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति