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शल्य पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
ऋषिः प्रसन्नस्तस्याभूत्संरम्भं च विहाय़ सः |  २३   क
मोक्षार्थं तस्य राष्ट्रस्य जुहाव पुनराहुतिम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति