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शल्य पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
मोक्षय़ित्वा ततो राष्ट्रं प्रतिगृह्य पशून्वहून् |  २४   क
हृष्टात्मा नैमिषारण्यं जगाम पुनरेव हि ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति