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शल्य पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रोऽपि धर्मात्मा स्वस्थचेता महामनाः |  २५   क
स्वमेव नगरं राजा प्रतिपेदे महर्द्धिमत् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति