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शल्य पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि विधिवद्दत्त्वा व्राह्मणेभ्यो महाय़शाः |  २८   क
वाजिनः कुञ्जरांश्चैव रथांश्चाश्वतरीय़ुतान् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति