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शल्य पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्र यज्ञे यय़ातेस्तु महाराज सरस्वती |  ३०   क
सर्पिः पय़श्च सुस्राव नाहुषस्य महात्मनः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति