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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
पञ्च नागसहस्राणि द्विगुणा वाजिनस्तथा |  ४८   क
अभिसंहत्य कौन्तेय़ पदातिप्रय़ुतानि च |  ४८   ख
अन्योन्यरक्षितं वीर वलं त्वामभिवर्तते ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति