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शल्य पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्र यत्र हि यो विप्रो यान्यान्कामानभीप्सति |  ३३   क
तत्र तत्र सरिच्छ्रेष्ठा ससर्ज सुवहून्रसान् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति