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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
शृणु राजन्निदं चित्रं पूर्वकल्पे यथातथम् |  ५   क
आदौ कृतय़ुगे तस्मिन्वर्तमाने यथाविधि |  ५   ख
वरुणं देवताः सर्वाः समेत्येदमथाव्रुवन् ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति