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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं पञ्चविंशत्या भीमसेनं च पञ्चभिः |  ५४   क
माद्रीपुत्रौ शतेनाजौ विव्याध निशितैः शरैः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति