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वन पर्व
अध्याय २५४
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द्रौपद्यु उवाच
विशीर्यन्तीं नावमिवार्णवान्ते; रत्नाभिपूर्णां मकरस्य पृष्ठे |  १९   क
सेनां तवेमां हतसर्वय़ोधां; विक्षोभितां द्रक्ष्यसि पाण्डुपुत्रैः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति