आदि पर्व  अध्याय ५३

शौनक उवाच

मनःसागरसम्भूतां महर्षेः पुण्यकर्मणः |  ३४   क
कथय़स्व सतां श्रेष्ठ न हि तृप्यामि सूतज ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति