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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
तं तथा व्यथितं दृष्ट्वा कृष्णो वचनमव्रवीत् |  २३   क
मा व्यथां कुरु कौन्तेय़ नैतत्त्वय़्युपपद्यते |  २३   ख
वैक्लव्यं भरतश्रेष्ठ यथा प्राकृतपूरुषे ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति