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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्य द्रोणो महेष्वासो न प्रादादाहवे मुखम् |  ४   क
तं जघ्ने रथिनां श्रेष्ठं धृष्टद्युम्नं कथं नु सः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति