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शान्ति पर्व
अध्याय २३७
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व्यास उवाच
आवर्तमानमजरं विवर्तनं; षण्णेमिकं द्वादशारं सुपर्व |  ३२   क
यस्येदमास्ये परिय़ाति विश्वं; तत्कालचक्रं निहितं गुहाय़ाम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति