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शान्ति पर्व
अध्याय ४१
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वैशम्पाय़न उवाच
एतदर्थं हि जीवामि कृत्वा ज्ञातिवधं महत् |  ५   क
अस्य शुश्रूषणं कार्यं मय़ा नित्यमतन्द्रिणा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति