वन पर्व  अध्याय १८५

मार्कण्डेय़ उवाच

उदकान्तमुपानीय़ मत्स्यं वैवस्वतो मनुः |  ११   क
अलिञ्जरे प्राक्षिपत्स चन्द्रांशुसदृशप्रभम् ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति