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कर्ण पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
चित्रं सम्प्रेक्ष्य निहतं तावका रणशोभिनः |  ३१   क
अभ्यद्रवन्त वेगेन प्रतिविन्ध्यं समन्ततः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति