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कर्ण पर्व
अध्याय ३२
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सञ्जय़ उवाच
तत्स्थाने समवस्थाप्य प्रत्यमित्रं महावलम् |  ३   क
अव्यूहतार्जुनो व्यूहं पुत्रस्य तव दुर्नय़े ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति