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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा वैवस्वतं लोकं केचिच्चैवाप्नुवन्नृपाः |  १५   क
राक्षसानां पिशाचानां केचिच्चाप्युत्तरान्कुरून् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति